भारत में रसोई गैस की कीमतों पर नियंत्रण जरूरी
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Published - 17 June 2026 1 views
घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) की कीमतों में बार-बार बढ़ोतरी चिंतनीय है। सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ तेल कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए घरेलू रसोई गैस की कीमतें बढ़ाने का रास्ता चुना है, जबकि इसका सीधा बोझ देश के लगभग 33.7 करोड़ सक्रिय घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। यह तब है जब वित्त वर्ष 2025-26 में सरकारी तेल कंपनियों ने संयुक्त रूप से 77,280.65 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 130 प्रतिशत अधिक है। अकेले इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) ने 36,802 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड लाभ दर्ज किया। 7 जून से 14.2 किलोग्राम के घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 29 रुपये की बढ़ोतरी की गई। यह तीन महीनों के भीतर दूसरी बढ़ोतरी है। इस वर्ष अब तक कुल बढ़ोतरी 89 रुपये प्रति सिलेंडर हो चुकी है। दूसरी ओर, पिछले वर्ष पेट्रोलियम क्षेत्र से करों और शुल्कों के रूप में सरकार को लगभग चार लाख करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ। इसके बावजूद उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है। दुनिया के कई तेल उत्पादक देश, जैसे सऊदी अरब, ईरान, वेनेजुएला, लीबिया और मलेशिया, अपने नागरिकों को वैश्विक मूल्य वृद्धि के प्रभाव से बचाने के लिए पेट्रोल, डीजल और गैस पर भारी सब्सिडी देते हैं। ये देश मूल्य नियंत्रण या प्रत्यक्ष सरकारी सहायता के माध्यम से ऊर्जा की कीमतों को अपेक्षाकृत कम बनाए रखते हैं और अक्सर तेल राजस्व का उपयोग वैश्विक मूल्य वृद्धि के झटके को सहने के लिए करते हैं। ईरान में ईंधन की कीमत दुनिया में सबसे कम मानी जाती है और वहां सरकार अरबों डॉलर की सब्सिडी देती है। वेनेजुएला भी आर्थिक और बुनियादी ढांचे की चुनौतियों के बावजूद अत्यंत कम कीमतों पर ईंधन उपलब्ध कराता है। सऊदी अरब घरेलू ऊर्जा लागत को स्थिर और किफायती बनाए रखने के लिए हर वर्ष 12 अरब डॉलर से अधिक की सब्सिडी देता है। लीबिया में पेट्रोल, डीजल और गैस पर दुनिया की सबसे अधिक सब्सिडी दी जाती है, जिससे कभी-कभी सीमा पार तस्करी जैसी समस्याएं भी पैदा होती हैं। मलेशिया अपने व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले आरओएन 95 ईंधन पर भारी सब्सिडी देता है, हालांकि हाल के वर्षों में वित्तीय दबाव कम करने के लिए प्रति नागरिक सब्सिडी वाली मात्रा पर सीमा निर्धारित की गई है। इसके विपरीत, दुनिया में सबसे अधिक गरीब आबादी वाले देशों में शामिल भारत में प्रत्यक्ष ईंधन और गैस सब्सिडी का दायरा सीमित है। सरकार की बहुचर्चित उज्ज्वला योजना के तहत पात्र लाभार्थियों को प्रति सिलेंडर 300 रुपये की सब्सिडी दी जाती है, लेकिन यह सुविधा अब साल में केवल चार सिलेंडरों तक सीमित कर दी गई है। इसके लिए वार्षिक बजट आवंटन लगभग 12,000 करोड़ रुपये है। हालांकि, इस मद में सरकार का वास्तविक व्यय कितना है, यह बहुत कम लोगों को पता है। योजना का लाभ केवल उन परिवारों को मिलता है जो गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) या सरकार द्वारा निर्धारित पात्रता मानदंडों के अंतर्गत आते हैं। दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत में वर्तमान में केवल 6.52 करोड़ परिवार ही बीपीएल श्रेणी में आते हैं। हर बार जब एलपीजी की कीमतें बढ़ाई जाती हैं, तब सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) के घाटे का तर्क सामने रखा जाता है। जबकि इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम जैसी कंपनियां देश की प्रमुख महारत्न सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां हैं और सरकार के राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं। इन कंपनियों में सरकार की नियंत्रक हिस्सेदारी है। इनके अलावा ओएनजीसी और ऑयल इंडिया जैसी अन्य सरकारी कंपनियों की भी इनमें हिस्सेदारी है। ओएनजीसी और ऑयल इंडिया अपस्ट्रीम तेल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां हैं, जबकि आईओसी, एचपीसीएल और बीपीसीएल डाउन स्ट्रीम क्षेत्र में कार्य करती हैं। ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में अलग-अलग भूमिकाएं निभाने के बावजूद ये सभी कंपनियां एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं और देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में ओएनजीसी और ऑयल इंडिया का संयुक्त शुद्ध लाभ लगभग 42,650 करोड़ रुपये रहा। पेट्रोलियम क्षेत्र केंद्र और राज्य सरकारों के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत है। अनुमान है कि यह क्षेत्र केंद्र सरकार के कुल कर राजस्व का लगभग 14 प्रतिशत और राज्यों के अपने कर राजस्व का लगभग 15 प्रतिशत योगदान देता है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान सरकारी तेल कंपनियों ने मिलकर 4.15 लाख करोड़ रुपये से अधिक का योगदान दिया, जिसमें जिसमें 92,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि केंद्र सरकार को प्रॉफिट पेट्रोलियम और सरकारी कंपनियों के लाभांश आदि के रूप में प्राप्त हुई। प्रॉफिट पेट्रोलियम से आशय तेल और गैस के अन्वेषण एवं उत्पादन से प्राप्त लाभ में सरकार की हिस्सेदारी से है। इसके अलावा ये कंपनियां कॉरपोरेट कर, उत्पाद शुल्क और वैट का भुगतान करती हैं तथा सरकार को नियमित रूप से बड़ा लाभांश भी देती हैं। ऐसे में यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि रसोई गैस की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी के लिए हर बार तेल विपणन कंपनियों के कथित घाटे का सहारा लिया जाता है। एलपीजी केवल एक वाणिज्यिक उत्पाद नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों के लिए भोजन पकाने की बुनियादी जरूरत है। सरकार इस विषय की संवेदनशीलता को समझती है। यही कारण है कि चुनावों से पहले आम तौर पर तेल और गैस की कीमतों में बढ़ोतरी से बचा जाता है। हाल में ईरान और खाड़ी क्षेत्र में तनाव तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उछाल के बावजूद हाल ही में संपन्न तमिलनाडु, असम, केरल, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी विधानसभा चुनावों से पहले घरेलू तेल कंपनियों को कीमतें बढ़ाने की अनुमति नहीं दी गई थी। वैश्विक स्तर पर ऊर्जा कीमतों और परिवहन लागत में बढ़ोतरी के कारण अधिकांश देशों की तरह भारत भी चुनौतियों का सामना कर रहा है। फिर भी, यदि सऊदी अरब और मलेशिया जैसे देश अपने नागरिकों को वैश्विक महंगाई से बचाने के लिए ईंधन और गैस पर भारी सब्सिडी दे सकते हैं, तो लोकतांत्रिक भारत में तीन सरकारी तेल विपणन कंपनियों के हित में 1.4 अरब से अधिक लोगों की कठिनाइयों की अनदेखी करते हुए रसोई गैस और ईंधन की कीमतों में बार-बार वृद्धि का कोई औचित्य नहीं है।
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